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ज्ञानेश कुमार ने सर्वसम्मति से लिए थे फैसले? EC ने दायर किया हलफनामा, आखिर कैसे पलटा खेल...पूरे विवाद की Inside Story

Gyanesh Kumar SIR Controversy: सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने हलफनामा दाखिल कर ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों को गलत बताया है। जानिए SIR विवाद कैसे शुरू हुआ, Form-6 पर क्या विवाद हुआ और अब तक की पूरी टाइमलाइन।

Gyanesh Kumar SIR Controversy: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंच चुका है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल कर उन आरोपों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) से जुड़े अहम फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए। आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े तीनों बड़े आदेश सर्वसम्मति (Unanimous) से लिए गए थे और ज्ञानेश कुमार ने अकेले कोई फैसला नहीं किया।

यानी जिस विवाद को लेकर पिछले कुछ हफ्तों में चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली, SIR और ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठे, अब उसी मामले में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना आधिकारिक पक्ष रखा है। आयोग ने यह भी कहा है कि याचिका की बुनियाद एक ही समाचार रिपोर्ट है और आंतरिक फाइलों में दर्ज किसी आयुक्त की टिप्पणी, सवाल या सुझाव को अपने आप आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

लेकिन आखिर यह पूरा विवाद शुरू कहां से हुआ? दो चुनाव आयुक्तों ने क्या आपत्तियां दर्ज की थीं? SIR और Form-6 इस कहानी में कहां से आ गए? सुप्रीम कोर्ट को मामला सुनने की जरूरत क्यों पड़ी और आज दाखिल हलफनामे में चुनाव आयोग ने इन आरोपों का क्या जवाब दिया? इसे समझने के लिए पूरी कहानी को तारीखवार देखना जरूरी है।

सबसे पहले समझिए SIR क्या है?

SIR यानी Special Intensive Revision (विशेष गहन पुनरीक्षण) मतदाता सूची (Voter List) की ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें चुनाव आयोग पुराने रिकॉर्ड के आधार पर मतदाता सूची की गहराई से जांच करता है। इसका मकसद पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखना और अपात्र या गलत प्रविष्टियों को हटाना है।

इस पूरी कहानी की शुरुआत 24 जून 2025 से हुई, जब चुनाव आयोग ने बिहार में SIR कराने का आदेश दिया। आयोग ने इसके पीछे तेजी से हो रहे शहरीकरण, पलायन, मृत्यु की सूचना दर्ज नहीं होने और मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों जैसे कारण बताए थे। यही बिहार वाला SIR बाद में पूरे विवाद की शुरुआत बना।

24 जून 2025: बिहार से शुरू हुआ SIR

24 जून 2025 को चुनाव आयोग ने बिहार की सभी विधानसभा सीटों में SIR शुरू करने का आदेश दिया। यह बिहार में 2003 के बाद पहला ऐसा बड़ा विशेष पुनरीक्षण था।

इसके तहत 2003 की पुरानी मतदाता सूची में शामिल लोगों को अलग स्थिति मिली, जबकि जिन लोगों का नाम उस सूची में नहीं था, उन्हें अपनी पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज देने थे। नए मतदाताओं के लिए Form-6 के साथ एक अतिरिक्त Declaration का भी प्रावधान रखा गया। यहीं से आगे चलकर Form-6 विवाद की जमीन तैयार हुई।

अक्टूबर 2025: विवाद बिहार से आगे बढ़ा

बिहार के बाद चुनाव आयोग ने SIR का दायरा बढ़ाया। 27 अक्टूबर 2025 को आयोग ने 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अगले चरण का SIR घोषित किया।

इसके बाद SIR सिर्फ बिहार का मामला नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता सूची की प्रक्रिया से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया। और इसी दौरान चुनाव आयोग के अंदर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर भी मतभेद सामने आने लगे।

28 अक्टूबर 2025: पहली दर्ज आपत्ति

एक अंग्रेजी अखबार की जांच के मुताबिक, 28 अक्टूबर 2025 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने एक आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट के अनुसार, उनका सवाल था कि आयोग की मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम से पत्र और आदेश कैसे जारी किए गए। बाद के महीनों में ऐसी आपत्तियों की संख्या बढ़ती गई। यही वे आंतरिक टिप्पणियां थीं, जिन्हें बाद में सितंबर 2026 में सार्वजनिक विवाद का आधार बनाया गया।

2026 में बढ़ता गया मतभेद

अप्रैल 2026 तक मामला केवल SIR के आदेशों तक सीमित नहीं था। चुनाव आयोग के भीतर IT सिस्टम, मतदाता डेटा और अधिकारियों के कामकाज को लेकर भी सवाल उठे।

एक अंग्रेजी अखबार की जांच के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता डेटा और IT सिस्टम तक पहुंच तथा पश्चिम बंगाल में मतदाता मामलों से जुड़ी अपीलों जैसे मुद्दे शामिल थे।

ध्यान रखना जरूरी है कि ये आरोप और आंतरिक मतभेद की व्याख्या एक अंग्रेजी अखबार की जांच और संबंधित याचिकाओं में लगाए गए दावों पर आधारित है। चुनाव आयोग ने बाद में इन दावों को चुनौती देते हुए कहा कि आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

16 मई 2026: Form-6 पर पहली बड़ी आपत्ति

विवाद का सबसे अहम हिस्सा Form-6 बना। Form-6 वह वैधानिक फॉर्म (Statutory Form) है जिसका इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है।

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, 16 मई 2026 को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने फाइल पर टिप्पणी करते हुए कहा कि Form-6 में बदलाव बिना Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन किए नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्रस्ताव को सरकार के पास भेजने की बात कही। 19 मई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस आपत्ति से सहमति जताई। लेकिन इसके बाद भी ऑनलाइन Form-6 में SIR से जुड़ा Declaration दिखाई देने लगा।

27 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR को वैध माना

इसी बीच 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR से जुड़ी याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने की चुनाव आयोग की शक्ति को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की शक्ति है और बिहार में किया गया SIR कानूनी ढांचे के भीतर था। लेकिन बाद में इसी फैसले को लेकर Form-6 पर अलग विवाद खड़ा हुआ।

चुनाव आयोग का कहना था कि SIR से जुड़ा अतिरिक्त Declaration सुप्रीम कोर्ट के फैसले में स्वीकार किया गया था। दूसरी तरफ बाद की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने उस नए Form-6 को अलग से मंजूरी नहीं दी थी और इस मुद्दे पर अभी जांच की जानी है। यहीं से विवाद और ज्यादा पेचीदा हो गया।

जुलाई 2026: Form-6 विवाद सामने आया

जुलाई में ऑनलाइन Form-6 के अंदर SIR से जुड़ा एक अतिरिक्त Declaration दिखाई दिया। इसमें नए मतदाता से यह जानकारी मांगी जा रही थी कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में था या नहीं। यदि नाम था तो उससे पुराने निर्वाचन क्षेत्र, पार्ट नंबर और क्रम संख्या जैसी जानकारी मांगी जा रही थी। यही बदलाव बाद में विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया।

12 जुलाई 2026: मीडिया रिपोर्ट से विवाद सार्वजनिक हुआ

12 जुलाई को इस नए Declaration को लेकर रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद चुनाव आयोग के अंदर पहले दर्ज की गई आपत्तियां भी चर्चा में आने लगीं।

13 अगस्त 2026 को संधू ने इस बदलाव पर फिर आपत्ति दर्ज की। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, उन्होंने इसे बिना उचित प्रक्रिया के किया गया बदलाव बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की।

यहीं से सवाल उठा कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने पहले ही Form-6 को लेकर कानूनी आपत्ति दर्ज की थी तो फिर यह बदलाव ऑनलाइन सिस्टम में कैसे आया?

28 जुलाई 2026: IT और काम के बंटवारे पर भी विवाद

Form-6 के अलावा 28 जुलाई 2026 का एक Work Allocation Order भी विवाद में आया। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, एक अधिकारी ने प्रशासनिक काम के बंटवारे से जुड़ा आदेश जारी किया था। संधू और जोशी ने इस पर सवाल उठाया और अगले दिन दोनों ने अलग-अलग पत्र कैबिनेट सचिव को भेजे।

दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर इस बदलाव को 2023 के कानून की धारा 18 से जोड़ते हुए आपत्ति दर्ज की। बाद में 30 जुलाई को दोनों आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद वह बदलाव लागू नहीं हुआ।

हालांकि चुनाव आयोग ने बाद में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह आदेश किसी आयुक्त द्वारा अकेले लिया गया चुनावी नीति संबंधी फैसला नहीं था और उसे लागू ही नहीं किया गया था।

14 अगस्त 2026: IT सिस्टम को लेकर चिंता

14 अगस्त तक विवाद सिर्फ Form-6 तक सीमित नहीं था। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त संधू ने मतदाता डेटा और ERONet जैसे सिस्टम तक पहुंच को लेकर भी चिंता दर्ज की। आरोप यह था कि कुछ अधिकारियों की पहुंच सीमित की गई थी और IT सिस्टम से जुड़ा नियंत्रण अधिक केंद्रीकृत हो रहा था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस मुद्दे पर कैबिनेट सचिव तक अपनी चिंता पहुंचाई।

9 सितंबर 2026: तीनों चुनाव आयुक्तों की अहम बैठक

लगातार आंतरिक मतभेद की खबरों के बीच 9 सितंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण बैठक हुई।

एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, यह कई महीनों के अंतराल के बाद तीनों की पहली पूर्ण बैठक थी। लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ।

23 सितंबर 2026: 14 आपत्तियों की रिपोर्ट ने मचाई हलचल

23 सितंबर को एक अंग्रेजी अखबार ने अपनी जांच प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि पिछले करीब 10 महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की थी।

रिपोर्ट में Form-6, मतदाता डेटा, नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता नाम हटाने और बहाल करने, पश्चिम बंगाल में अपील और IT सिस्टम जैसे मुद्दों का जिक्र किया गया। यहीं से मामला राष्ट्रीय राजनीतिक और संवैधानिक बहस का हिस्सा बन गया।

24-26 सितंबर: चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा

रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि उसके सभी फैसले, जिसमें SIR भी शामिल है, सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

26 सितंबर को तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई। इसके बाद आयोग ने कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण जारी किया। आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े आदेशों को पूरी आयोग की मंजूरी थी और IT से जुड़े विवाद में जिस अधिकारी के काम का मुद्दा था, उसके द्वारा जारी Work Allocation Order को बाद में लागू नहीं किया गया। लेकिन इसी दौरान Form-6 को लेकर आयोग के एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया

Form-6 पर SC की टिप्पणी से और गंभीर हुआ मामला 

26 सितंबर को आयोग ने कहा कि SIR से जुड़ा Form-6 Declaration सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले में बरकरार रखा गया था।

इसके बाद जब यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो 5 अक्टूबर 2026 को CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अदालत ने Form-6 के किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी थी और वह रिकॉर्ड देखकर यह पता लगाएगी कि बदलाव किसने किया।

वहीं इसके बाद 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने और स्पष्ट किया कि मई के बिहार SIR फैसले में नए Form-6 पर फैसला हुआ ही नहीं था। यानी अदालत ने न उसे मंजूर किया था और न खारिज।

5 अक्टूबर 2026: SC  ने CEC पर लगे आरोपों वाली याचिका पर नोटिस दिया

इसी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिका पहुंची।

याचिका में आरोप लगाया गया कि कुछ फैसले बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए और इससे बहुसदस्यीय चुनाव आयोग (Multi-Member Election Commission) की संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित हुई।

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र, चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार और दूसरे संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा। अदालत ने उस समय ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश नहीं दिया।

CJI ने कहा कि अदालत रिकॉर्ड देखेगी और अगर कोई फैसला कानून में तय प्रक्रिया के मुताबिक नहीं लिया गया होगा तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सकती है।

अब आया 26 अक्टूबर 2026 का सबसे बड़ा मोड़

और अब 26 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल कर दिया है। आयोग ने साफ तौर पर कहा है कि SIR से जुड़े तीनों आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे।

वो तीन आदेश हैं—

24 जून 2025: SIR की शुरुआत का आदेश।

27 अक्टूबर 2025: 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अगला चरण।

14 मई 2026: अगले चरण के लिए 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ा आदेश।

आयोग का कहना है कि तीनों आदेशों को सभी सदस्यों की मंजूरी मिली थी।

आयोग ने कहा- फाइल पर लिखी टिप्पणी अंतिम फैसला नहीं

हलफनामे में चुनाव आयोग ने एक महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक बात कही है।

आयोग के मुताबिक, किसी फाइल पर किसी चुनाव आयुक्त द्वारा लिखी गई टिप्पणी, सवाल, सुझाव या आपत्ति को अपने आप आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।

आयोग ने बताया कि सामान्य प्रक्रिया में फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास जाती है, फिर दूसरे के पास और उसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने आती है। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भी मंजूरी ली जा सकती है और बाद में उसे फाइल पर दर्ज किया जाता है। यानी आयोग का ताजा तर्क यह है कि आंतरिक असहमति और अंतिम संस्थागत फैसला दो अलग चीजें हैं।

Form-6 पर भी आयोग का जवाब

Form-6 के मुद्दे पर आयोग ने कहा है कि Form-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया।

आयोग का कहना है कि SIR के लिए जो अतिरिक्त Declaration इस्तेमाल किया गया, वह अलग व्यवस्था थी और इसे Form-6 में वैधानिक संशोधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने रिकॉर्ड देखने और संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखने की बात कही है।

पश्चिम बंगाल और दूसरे आरोपों पर भी सफाई

याचिकाओं और रिपोर्टों में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये अपीलें आयोग के नाम पर दाखिल की गईं और दूसरे चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी नहीं थी। दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने कहा है कि पश्चिम बंगाल से संबंधित कुछ अपीलें अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन में दाखिल की थीं और वे मामले आयोग के सामने नहीं लाए गए थे।

इसलिए इस हिस्से में भी आरोप और आयोग का जवाब दोनों अलग-अलग मौजूद हैं, जबकि अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी बाकी है।

एक नजर में समझिए पूरी टाइमलाइन 

24 जून 2025: बिहार में SIR का आदेश जारी हुआ।

28 अक्टूबर 2025: चुनाव आयुक्त संधू ने पहली दर्ज आपत्तियों में से एक दर्ज की।

27 अक्टूबर 2025: 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के अगले चरण का आदेश जारी हुआ।

16 मई 2026: विवेक जोशी ने Form-6 में बदलाव की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की।

19 मई 2026: सुखबीर सिंह संधू ने इस आपत्ति से सहमति जताई।

27 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR की वैधता बरकरार रखी।

12 जुलाई 2026: ऑनलाइन Form-6 में SIR से जुड़ा नया Declaration सामने आने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

28 जुलाई 2026: Work Allocation Order को लेकर विवाद सामने आया।

13 अगस्त 2026: संधू ने Form-6 में किए गए बदलाव को लेकर फिर आपत्ति दर्ज की।

14 अगस्त 2026: IT और मतदाता डेटा सिस्टम से जुड़ी चिंताएं रिकॉर्ड पर आईं।

9 सितंबर 2026: तीनों चुनाव आयुक्तों की महत्वपूर्ण बैठक हुई।

23 सितंबर 2026: एक अंग्रेजी अखबार ने 10 महीनों में 14 आपत्तियों वाली जांच प्रकाशित की।

26 सितंबर 2026: तीनों आयुक्तों की बैठक के बाद ECI ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताया।

5 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया और अंतरिम रूप से CEC को हटाने से इनकार किया।

12 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नए Form-6 पर मई के फैसले में कोई adjudication नहीं हुआ था।

26 अक्टूबर 2026: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल कर कहा कि SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे और ज्ञानेश कुमार के अकेले फैसले लेने के आरोप गलत हैं।

आखिर क्या है असली विवाद?

पूरे मामले को अगर बेहद आसान भाषा में समझें तो विवाद SIR करने के अधिकार से ज्यादा अब SIR से जुड़े फैसले लेने की प्रक्रिया पर है।

एक तरफ याचिकाकर्ताओं और एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट में सामने आए दस्तावेजों के आधार पर यह सवाल उठाया गया है कि क्या तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में कुछ फैसले बाकी सदस्यों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।

दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक फाइलों में अलग-अलग राय होना सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले बहुमत या सर्वसम्मति की निर्धारित प्रक्रिया से ही लिए गए। अब आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में यही बात हलफनामे के रूप में रखी है।

इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों को सही या गलत ठहरा दिया है। 26 अक्टूबर का हलफनामा चुनाव आयोग का जवाब है, अंतिम न्यायिक फैसला नहीं। सुप्रीम कोर्ट अब रिकॉर्ड और संबंधित याचिकाओं के आधार पर यह देखेगा कि आयोग के फैसले कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए थे या नहीं।

यही वजह है कि आने वाली सुनवाई इस पूरे विवाद में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्योंकि मामला सिर्फ ज्ञानेश कुमार के व्यक्तिगत कामकाज का नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि भारत का तीन सदस्यीय चुनाव आयोग (Multi-Member Election Commission) अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल किस प्रक्रिया से करता है।

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