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उत्तराखंड के मदरसों में 'जुम्मे की छुट्टी' खत्म! धामी सरकार का बड़ा फैसला, अब इस दिन लगेगा ताला

Uttarakhand Madarsa Holiday: उत्तराखंड की धामी सरकार ने मदरसों में शुक्रवार की जुम्मे की छुट्टी खत्म कर रविवार को साप्ताहिक अवकाश करने का फैसला लिया है। जानें सरकार और विपक्ष की क्या है दलील।

Uttrakhand Madarsa Holiday: देवभूमि उत्तराखंड से आज एक बड़ी खबर सामने आई है। जहां धामी सरकार ने एक और बड़ा और कड़ा फैसला लेते हुए मदरसों में सालों से चली आ रही शुक्रवार यानि जुम्मे की छुट्टी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। जिसके बाद अब अब उत्तराखंड के मदरसों में भी बाकी स्कूलों की तरह रविवार को ही ताला लगेगा और छुट्टी होगी। इसको लेकर सरकार का यह कहना है कि ‘नियम सबके लिए एक समान हैं।’ लेकिन इस फैसले के सामने आते ही सियासत का पारा भी हाई हो गया है और मुस्लिम समाज के भीतर से भी दो अलग-अलग सुर सुनाई देने लगे हैं। आइए जानते हैं क्या है पूरी खबर और इस पर क्यों मचा है सियासी बवाल।

अब जुम्मे की जगह रविवार को होगी छुट्टी!

देवभूमि उत्तराखंड अपने कड़े और बड़े फैसलों के लिए इन दिनों देश भर की सुर्खियों में छाया हुआ है। समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने वाले इस राज्य ने अब शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक और ऐसा कदम उठाया है, जिसने सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने राज्य के मदरसों में शुक्रवार यानी ‘जुम्मे’ के दिन मिलने वाली साप्ताहिक छुट्टी को खत्म कर दिया है। अब प्रदेश के सभी मदरसों में बाकी आम स्कूलों की तरह रविवार को ही वीकली हॉलिडे माना जाएगा।

CM धामी बोले- नियम सबके लिए एक

दरअसल, हाल ही में पुलिस लाइन के एक कार्यक्रम के दौरान जब मीडिया ने सीएम पुष्कर सिंह धामी से इस फैसले पर सवाल किया, तो उन्होंने दो टूक अंदाज में अपनी बात रखी। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) पहले से लागू है। ऐसे में जब कानून सबके लिए एक है, तो शिक्षा और व्यवस्था के नियम भी सबके लिए एक जैसे ही होने चाहिए। सरकार का मानना है कि राज्य के हर बच्चे को एक समान शैक्षणिक माहौल मिलना चाहिए, चाहे वह किसी भी स्कूल या मदरसे में क्यों न पढ़ता हो।

कांग्रेस ने बताया ‘सियासी स्टंट’

मदरसों में जुम्मे की छुट्टी रद्द होने के बाद सूबे की राजनीति में भूचाल आना तो लाजिमी था। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस फैसले पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस की प्रदेश प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह ने इस फैसले को सरकार का महज एक ‘सियासी स्टंट’ करार दिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि, “मौजूदा सरकार के पास मस्जिद, मदरसा और मजार के अलावा बात करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है।” दरअसल, कांग्रेस का तर्क है कि मदरसों में शुक्रवार की छुट्टी कोई मनगढ़ंत परंपरा नहीं थी, बल्कि उस दिन होने वाली विशेष जुमे की नमाज की वजह से यह व्यवस्था दी गई थी। कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि सरकार ने मदरसा व्यवस्था पर बड़े फैसले तो ले लिए हैं, लेकिन जो मदरसे अभी चल रहे हैं, उनकी जमीनी हकीकत और बदहाली को सुधारने वाला कोई नहीं है।

मुस्लिम समाज और शिक्षकों की जुबान पर क्या?

वहीं इस पूरे मामले पर मुस्लिम समाज के भीतर से मिले-जुले और दो अलग-अलग तरह के विचार सामने आ रहे हैं। आपको बता दें देहरादून के कई मदरसा शिक्षकों ने सरकार के इस आदेश का सकारात्मक स्वागत किया है। ‘इमदाद उल उलूम’ की कोऑर्डिनेटर शमा खान ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि वे सरकार के आदेश का पूरा पालन करेंगे। हालांकि, कुछ शिक्षकों ने यह जरूर राय रखी कि अगर शुक्रवार के दिन पढ़ाई के घंटों में थोड़ा लचीलापन यानी ‘हाफ डे’ या जुमे की नमाज के लिए कुछ समय की राहत मिल जाती, तो बच्चों को नमाज अदा करने में और भी ज्यादा सहूलियत हो जाती। लेकिन वहीं दूसरी तरफ, मुस्लिम समाज के एक धड़े ने इस बदलाव पर अपनी गहरी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि जुमे की छुट्टी उनकी धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ी हुई थी, जिसे बिना किसी बड़े संवाद के बदला गया है।

बहरहाल, देखा जाए तो एक तरफ जहां धामी सरकार इसे ‘समानता और एकरुपता’ का बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की सियासत करार दे रहा है। ऐसे में अब देखना यह होगा कि सरकार शिक्षकों की उस मांग पर कोई नरम रुख अपनाती है या नहीं, जिसमें जुमे के दिन थोड़े वक्त की राहत मांगी गई है। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में इस फैसले के बाद गरमागरम बहस का दौर शुरू हो चुका है।

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