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छत्तीसगढ़ के इस गांव से अयोध्या तक पहुंच रहे मिट्टी के दीये, 300 परिवारों की चमकी किस्मत

Diwali 2026: दीपावली का पर्व आते ही देशभर में घर-आंगन मिट्टी के दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं। इन दीयों की लौ सिर्फ अंधकार को दूर करने का प्रतीक नहीं होती, बल्कि इनके पीछे छिपी होती है उन कारीगरों की मेहनत, परंपरा और उम्मीदें, जो पीढ़ियों से अपने पुश्तैनी हुनर को संजोए हुए हैं। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का सिरसा खुर्द गांव आज इसी परंपरा और मेहनत की एक खूबसूरत मिसाल बनकर उभरा है। यहां मिट्टी के दीये केवल घरों को रोशन नहीं कर रहे, बल्कि सैकड़ों कुम्हार परिवारों के जीवन में भी खुशियों और रोजगार का उजाला फैला रहे हैं।

Diwali 2026: दीपावली का पर्व आते ही देशभर में घर-आंगन मिट्टी के दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं। इन दीयों की लौ सिर्फ अंधकार को दूर करने का प्रतीक नहीं होती, बल्कि इनके पीछे छिपी होती है उन कारीगरों की मेहनत, परंपरा और उम्मीदें, जो पीढ़ियों से अपने पुश्तैनी हुनर को संजोए हुए हैं। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का सिरसा खुर्द गांव आज इसी परंपरा और मेहनत की एक खूबसूरत मिसाल बनकर उभरा है। यहां मिट्टी के दीये केवल घरों को रोशन नहीं कर रहे, बल्कि सैकड़ों कुम्हार परिवारों के जीवन में भी खुशियों और रोजगार का उजाला फैला रहे हैं।

दीपावली नजदीक आते ही सिरसा खुर्द गांव की तस्वीर बदल जाती है। घरों में चाक की रफ्तार तेज हो जाती है, आंगनों में मिट्टी के दीये कतारों में सजने लगते हैं और परिवार का हर सदस्य इस काम में जुट जाता है। कोई मिट्टी तैयार करता है, कोई चाक पर दीयों को आकार देता है, तो कोई उन्हें धूप में सुखाने और भट्ठियों में पकाने की जिम्मेदारी संभालता है। गांव का माहौल मानो मिट्टी के दीयों की एक बड़ी कार्यशाला में बदल जाता है। इस गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां करीब 200 कुम्हार परिवार पीढ़ियों से चले आ रहे अपने पारंपरिक हुनर के सहारे आजीविका चला रहे हैं। दीपावली के अवसर पर इन परिवारों का काम कई गुना बढ़ जाता है। स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाले इन दीयों की मांग केवल दुर्ग और भिलाई तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश की राजधानी रायपुर से लेकर उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी अयोध्या तक पहुंच रही है।

अयोध्या के दीपोत्सव तक पहुंच रही सिरसा खुर्द के कारीगरों की मेहनत

सिरसा खुर्द में तैयार होने वाले मिट्टी के दीयों की पहचान अब स्थानीय बाजारों से निकलकर दूसरे राज्यों तक बन चुकी है। दुर्ग, भिलाई और रायपुर जैसे शहरों के व्यापारी यहां पहुंचकर सीधे कुम्हारों से दीये खरीदते हैं। इतना ही नहीं, अयोध्या में आयोजित होने वाले भव्य दीपोत्सव के लिए भी यहां से दीयों की आपूर्ति की जाती है। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद पारंपरिक हुनर को सही बाजार और अवसर मिलें तो स्थानीय उत्पाद बड़े आयोजनों और बाजारों तक अपनी जगह बना सकते हैं। बाहरी व्यापारियों का सीधे गांव पहुंचना कारीगरों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है। इससे उन्हें अपने उत्पाद बेचने के लिए दूर-दराज के बाजारों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और उनके हुनर को व्यापक पहचान मिल रही है। दीपावली से करीब 15 दिन पहले ही गांव में उत्पादन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। कुम्हार परिवार दिन-रात मेहनत करके बड़ी संख्या में दीये तैयार करते हैं, ताकि समय रहते अलग-अलग शहरों और बाजारों में उनकी आपूर्ति की जा सके।

लाखों दीयों के निर्माण से जुड़ी है सैकड़ों परिवारों की आजीविका

गांव के कुम्हार पंचराम बताते हैं कि दीपावली के लिए दीये बनाने की तैयारी लगभग 15 दिन पहले शुरू हो जाती है। इस दौरान परिवार के सभी सदस्य उत्पादन में हाथ बंटाते हैं। उनके मुताबिक, यहां तैयार किए गए दीये दुर्ग, भिलाई, रायपुर और अयोध्या तक भेजे जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस पारंपरिक व्यवसाय से ढाई से तीन सौ परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है और एक स्तर पर सात से आठ लाख तक दीयों का निर्माण किया जाता है।

हालांकि, इस काम में मेहनत के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। दीयों को तैयार करने के बाद उन्हें पकाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। लकड़ी की बढ़ती कीमतों के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है। पंचराम के अनुसार, कई बार लागत अधिक होने की वजह से कुम्हारों का मुनाफा काफी कम रह जाता है। इसके बावजूद परिवार अपनी परंपरा और हुनर को आगे बढ़ाने के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं।

दरअसल, मिट्टी के दीये तैयार करने की प्रक्रिया केवल चाक पर मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है। इसके लिए मिट्टी जुटाने, उसे तैयार करने, दीयों को सही आकार देने, सुखाने और पकाने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। हर चरण में समय, श्रम और अनुभव की जरूरत होती है। यही वजह है कि कुम्हारों के लिए यह केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और विरासत भी है।

वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भर भारत की भावना को दे रहा मजबूती

सिरसा खुर्द गांव की यह कहानी स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों का मूल उद्देश्य भी यही है कि देश के स्थानीय कारीगरों, छोटे उत्पादकों और पारंपरिक व्यवसायों को प्रोत्साहन मिले। जब लोग स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, तो इसका सीधा लाभ उन परिवारों तक पहुंचता है, जिनकी आजीविका इन्हीं कामों पर निर्भर होती है।

मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने से सिरसा खुर्द के कुम्हारों को अपने हुनर के लिए बड़ा बाजार मिल रहा है। इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपने पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े रहने की प्रेरणा मिल रही है। स्थानीय स्तर पर उत्पादन और व्यापारियों की सीधी खरीदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अहम भूमिका निभा रही है।
आज जब बाजार में रोशनी के कई आधुनिक विकल्प मौजूद हैं, तब भी मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और महत्व बना हुआ है। इनकी लौ में भारतीय परंपरा, संस्कृति और स्थानीय कारीगरों की मेहनत की झलक दिखाई देती है। सिरसा खुर्द के कुम्हार इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपनी मेहनत से देश के अलग-अलग हिस्सों में दीपावली की खुशियां पहुंचा रहे हैं।

दीयों की रोशनी के साथ घरों में लौट रही खुशहाली

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का सिरसा खुर्द गांव यह संदेश देता है कि आत्मनिर्भरता केवल बड़े उद्योगों और शहरों तक सीमित नहीं है। गांवों में मौजूद पारंपरिक हुनर, स्थानीय संसाधन और मेहनतकश हाथ भी आर्थिक मजबूती की बड़ी नींव बन सकते हैं। जरूरत है तो बस ऐसे उत्पादों को उचित बाजार, बेहतर अवसर और उपभोक्ताओं का सहयोग मिलने की। इस दीपावली जब देशभर के घरों में सिरसा खुर्द के कुम्हारों के बनाए दीये जलेंगे, तब उनकी रोशनी के साथ उन परिवारों की मेहनत भी चमकेगी, जिन्होंने दिन-रात एक करके इन्हें तैयार किया है। हर दीये की लौ अपने साथ एक कारीगर की उम्मीद, एक परिवार की आजीविका और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की कहानी लेकर आगे बढ़ेगी। सचमुच, सिरसा खुर्द में इस बार दीपावली सिर्फ मिट्टी के दीयों से नहीं, बल्कि मेहनत, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता के उजाले से भी रोशन हो रही है।

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